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Friday, 25 August 2017

इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी-----------

सौ दर्द भरे   अफसानों में   इक मेरा भी   अफसाना है
इक तेरे तबस्सुम की ख़ातिर मुझे गीत वफा के गाना है

कुछ कर्म हमारे हाथों में  कुछ है तेरी  मंजूरी भी
दस्तूर यही इस दुनियां का कुछ खोना है कुछ पाना है

तू ही तो सब  कुछ है पर तसक़ीम  समझना है मुश्किल
कुछ को मिला सिफर हाथों में कुछ को मिला ख़जाना है

इमदाद मुझे ईमानों की  कुछ और जरा दे दे साक़ी
मैं रिन्द हुँ तेरी आंखों का उस पार मुझे भी जाना है

जब जन्म लिया इस धरती पर हक मेरा भी तसलीम करो
जिन कन्धों पर यह देश टिका उसमें मेरा भी शाना है

वादा करना कायम रहना इतना तो आसान नहीं था
तुम एक जनम में ऊब गये मुझे सातों जनम निभाना है

बस  इक जरा सी हरकत से ही प्यार तुम्हारा टूट गया
अब वक्त कहाँ है हाथों में बस जीवन भर पछताना है

             ---------राजेश कुमार राय---------

Saturday, 22 July 2017

कितना खुश है आज परिंदा ...........

कोई खुशी है या कोई गम है
आँख हमारी  क्यों पुरनम है

प्यार तुम्हारा  मेरा  ख़जाना
जितना दे दो  उतना  कम है

तेरा  बरसना या चुप  रहना
या तो  सागर या  शबनम है

कितना खुश है आज परिंदा
दश्त में जैसे एक ज़मज़म है

एक  सियासत  लाखों  चेहरे
वो   रहबर है  या   रहजन है

साथ नहीं हो फिर भी लगता
साथ  तुम्हारा   यूँ हर दम  है

बज़्मे-सुखन   में तेरा  आना
हर  मौसम  में  इक मौसम है

मेरा  दुश्मन  दोस्त है  उसका
रिश्तों  में  कितनी  उलझन है

------राजेश कुमार राय------

Wednesday, 21 June 2017

मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में ------------

प्यार भी  दुश्वार है  दुनियाँ की  नजर में
साहिल पे बहुत शोर है चल बीच भंवर में

इक शख़्स अपनी हार से इतना ख़फा हुआ
कहता है  जहर और दे  कश्कोले-जहर में

सोचता था तेरे नाम का एक शेर लिखूंगा
आज तक उलझा रहा ग़ज़लों के बहर में

लौट के आना था सो मैं आ गया मगर
मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में

हम सब को लूट कर वो विलायत चला गया
अक़्सर दिखाई देता है दुनियां की ख़बर में

पत्थर चलाये  जा रहे एक दूसरे पे सब
सूझता है कुछ नहीं जुल्मत के कहर में

मुतमइन हूँ बादशाह के हर फैसले से मैं
एक उम्मीद दिख रही है पैगामे-शजर में

       ----------राजेश कुमार राय---------

Sunday, 21 May 2017

एक मिट्टी का बदन, चंद रिदाएँ होंगी------------

ज़िस्म इंसान का है  कुछ तो   ख़ताएँ होंगी 
ज़िंदगी का है   सफ़र कुछ तो  बलाएँ होंगी

उसके लहज़े में महकती है वतन की खुशबू
कुछ मिट्टी  का असर, माँ की   दुआएँ होंगी

एक तिनके को   जलाने में   जल गई बस्ती
मेरा दावा है कि   साज़िश में     हवाएँ होंगी

हल्का हल्का ही सही   कान में  टकरातीं  हैं
खुश्क मौंसम में   परिंदों की    सदाएँ  होंगी

एक पागल   भी मोहब्बत में   सोचता होगा
मेरे महबूब के    ज़ुल्फों में      अदाएँ होंगी

अब उस पार ही  हम सब का  फैसला होगा
जैसा  किरदार है    वैसी ही     सज़ाएँ होंगी

आखिरी वक्त में   सामाने-सफ़र  क्या होगा
एक  मिट्टी का बदन,   चंद रिदाएँ होंगी
    
         --------राजेश कुमार राय-------



Saturday, 22 April 2017

थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है--------

मायूसी है   भारीपन है   कुछ दर्द    पिघलना  बाकी है
थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है

दुनियां की  चालों में  फंसकर  कुछ तेवर  मेरा बदला है
ऐ यार जरा   ठोकर दे दे   कुछ और  सम्हलना बाकी है

दीपक की जलती लौ को तुम कुछ और बढ़ाकर तेज करो
जलने वाले   परवानों का  कुछ और   मचलना बाकी  है

ऐ इश्क़   बहुत उलझाया है  थोड़ा और हमें  उलझा देना
जीवन की बीच दोपहरी में थोड़ा और  उलझना बाकी है

भारत के दुश्मन  का देखो   क्या हश्र हुआ  अरमानों का
कुछ अरमां उनके कुचल गए कुछ और कुचलना बाकी है

ऐ मेरे प्रियतम  और सजो  कुछ और तुम्हारे  सजने से
द़िल मेरा बहुतों उछल चुका कुछ और उछलना बाकी है

माहौल हमारा   ऐसा हो कि    बेटी का   सम्मान बढ़े
जग थोड़ा थोड़ा बदला है कुछ और बदलना बाकी है

            ---------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 25 March 2017

वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है --------

आँखों   में नशेमन   ढ़ो    रहा है
किसी की याद में बस  रो रहा है

आँचल माँ का फिर से पा गया है
कई दिन से मुसलसल सो रहा है

हमेशा ज़ुल्म  से   लड़ता रहा जो
वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है

बदलते   दौर में इंसाँ की फितरत
मसल कर   फूल काँटे  बो रहा है

बहुत दिन बाद बेटी घर को आयी
खुशी  से   बाप पागल   हो रहा है

उसी को   याद करती   है रियाया
ज़माने     का दुलारा    जो रहा है

माज़ी   का द़रीचा    खोल कर के
कोई ". राजेश" उसमें   खो रहा है

   --------राजेश कुमार राय।--------

Monday, 6 February 2017

हमे भी सोचना होगा, तुम्हें भी सोचना होगा ---------

इस दौर के रिश्ते बड़े नाजुक से होते हैं
कभी वो मुस्कुराते हैं, कभी पलकें भीगोते हैं
जरा सी बात पर ही द़िल में इनके दर्द उठता है
मझधार में ही प्यार के रिश्ते डूबोते हैं
टुटन का दौर जारी है बता कैसे बचायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा ।

बहते हुए दरिया के पानी में रवानी है
इस मुल्क़ की नदियों की कुछ अपनी कहानी है
कूड़ाघर समझते हो जिसे ऐ मुल्क़ के लोगों
वही गंगा हमारे देश की सच्ची निशानी है
सब लोग सोये हैं बता कैसे जगायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

ईद और होली यहाँ मिलकर मनाते हैं
ज़ंगे-आजादी के सब किस्से सुनाते हैं
जरा सी बात क्या बिगड़ी कि नैज़े बात करते हैं
सियासी लोग अपने हक़ में ही मौका भुनाते हैं
अमन की राह में अब इक दिया कैसे जलायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

भाई का भाई अब नहीं होता यहाँ कोई
किसी का दर्द लेकर अब नहीं रोता यहाँ कोई
दूसरों का वक्त जितना मिल सके ले लो
पर वक्त अपना अब नहीं खोता यहाँ कोई
अब प्यार की गंगा बता कैसे बहायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

इस देश की बगिया में एक चिड़िया चहकती है
इस देश में ही रात की रानी महकती है
हर तरह के मौसमों का देश है मेरा
सावन में धरती भी यहाँ धानी चमकती है
आबाद हो गुलशन बता कैसे सजायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

     ---------राजेश कुमार राय।--------

Friday, 30 December 2016

बेटी परायी हो गयी, इक रूख़सती के बाद -------------

तूफ़ान हँस रहा है कश्ती के हाल पर
कश्ती को भरोसा है समंदर की चाल पर।

चिड़िया चहक रही है पेड़ों की डाल पर
एक शेर लिख दिया है तसव्वुर के गाल पर।

बेटी परायी हो गयी इक रूख़सती के बाद
आँसू तड़प के गिर पड़े मेरे रूमाल पर।

वो आग बरसता है तो पानी भी बरसता है
हम सब को भरोसा है खुद़ा के कमाल पर।

हाँलाकि हकिक़त थी, जुबाँ से निकल गयी
अब कुछ नहीं कहना मुझे उसके मलाल पर।

हरगिज़ न फँसेंगे, था परिन्दों का फैसला
हैरान रह गया था शिकारी भी जाल पर।

सरहद से जंग जीतकर लौटेगें ये जवान
फक्र है इस देश को माटी के लाल पर।

      --------राजेश कुमार राय।--------

Tuesday, 15 November 2016

पत्थर के पैरहन में जंगल की ज़िदगी--------

इक रेत की दीवार फिसलती चली गयी
बुनियाद भी कमजोर थी हिलती चली गयी।

उम्मीद थी कि फिर से मिलेंगे जरूर हम
हिज्र की इक शाम थी ढ़लती चली गयी।

ख़ामोश ही रहेंगे यही सोच रहा था
पर बात जो निकली तो निकलती चली गयी।

जुगनूँ जो आफ़ताब की इज्ज़त न कर सका
जुबाँ  खुली तो आग उगलती चली गयी।

पत्थर के पैरहन में जंगल की ज़िदगी
बस एक ही लिबास में चलती चली गयी।

हसरत की इंतहा ने उसे तोड़ दिया है
तक्द़ीर ही खराब थी छलती चली गयी।

तहज़ीब मिट रही है रिश्तों के बीच से
तरक्की के साथ दुनियाँ बदलती चली गयी।

      ---------राजेश कुमार राय।--------

Sunday, 2 October 2016

क्या नेकियाँ भी छीन लेगा नामए आमाल से !-----

                       (1)
मौसम के परिंदों नें इक आह भरी ऐसी
जाता हुआ बादल भी पल भर को ठहर जाये।

                       (2)
दुनियाँ में चमकते हैं, वो लोग बहुत अक्सर
जो खुद को जलाकर के जग रौशन करते हैं।

                       (3)
मुहब्बत की तश्नगी है, ऐसे न बुझेगी
आ मिल के इनकी आसूँओं से प्यास बुझा दें।

                       (4)
सब छीन लेता है वो अपने बाजुओं के जोर से
क्या नेकियाँ भी छीन लेगा नामए आमाल से !

                       (5)
मेरे दस्तक मे जाने कौन से अल्फाज़ बसते हैं
मेरा महबूब मेरी हर सदा पहचान लेता है।

                       (6)
अगर प्रतिकार करना है, कलम को हाथ में ले लो
अदब के हाथ में खंज़र कभी शोभा नहीं देता।

         ----------राजेश कुमार राय।----------
                 

Saturday, 13 August 2016

सितारे पूछते हैं आसमाँ से, ऐ जमीं वालों...........

किसी के नाम पर आँसू बहाना कब तलक होगा
नसों के खून को जिंदा जलाना कब तलक होगा।

बहुत आँसू बहाते हैं, तुम्हारी याद के मंज़र
तुम्हारी याद मे खुद को रूलाना कब तलक होगा।

उन्हें कुछ मांगना है तो हुकूमत से ही मांगे वो
बता मासूम ही उनका निशाना कब तलक होगा।

किसी के दर्द मे फिर दर्द देकर क्या किया तुमने
कि ऐसे हौसलों को आजमाना कब तलक होगा।

कभी मुस्कान देते हो कभी तुम छीन लेते हो
कभी ऊँचा उठाना फिर गिराना कब तलक होगा।

सितारे पूछते हैं आसमाँ से ऐ जम़ी वालों
किसी का पर कतरना फिर उड़ाना कब तलक होगा।

गुनाहों की सजा ऐसी मुकर्रर कर मेरे मौला
खुली दुनियाँ दरिंदों का ठिकाना कब तलक होगा।
     
           --------राजेश कुमार राय।-------

Saturday, 18 June 2016

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब------

तेरी बद्दुआ भी द़िल से लगाऊँगा देखना
शाम ढ़ले घर तेरे आऊँगा देखना।

बेटी है मेरी, खून है, और लख़्ते-ज़िगर भी
उसके लिये हर बोझ उठाऊँगा देखना।

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब
मर जाऊँगा पर सर न झुकाऊँगा देखना।

तन्हा हुआ तो क्या हुआ ! इक मैकद़ा तो है
सारी दुआ साकी पे लुटाऊँगा देखना

तेरे लिये ऐ दोस्त जरूरी हुआ अगर
उस बेवफ़ा से हाथ मिलाऊँगा देखना।

हालांकि तेरी रूह मयस्सर न हो सकी
वादा किया था जो भी निभाऊँगा देखना।

दुश्मन है मेरा लाख, मगर वक्त पे "राजेश"
नशेमन मे लगी आग बुझाऊँगा देखना।

         ------राजेश कुमार राय।-------

Thursday, 19 May 2016

रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला............

                    (1)
किसी को दर्द क्या देना !  किसी से दुश्मनी कैसी !
ये तेरा ज़िस्म फ़ानी है किसी दिन रूठ जायेगा।

                   (2)
बुजुर्गों के लिये थोड़ी मुहब्बत द़िल मे रख लेना
मुसलसल उम्र ढ़लती है शज़र गिर जायेगा एक दिन।

                   (3)
बड़ी देर तक खड़ा था आईने के रूबरू
लगता था मेरे अक्स मे कोई और आ गया।

                   (4)
रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला
इतना जले कि जल के हवा ही बिखर गयी।

                   (5)
जिंदा बचा हुआ है सौ वार झेलकर
जाँबाज ने शमशीर की औकात बता दी।

                   (6)
सारे ग़म डूबो देना हौसलों की चाहत से
ज़िंदगी की वादी में, तब बहार आयेगी।

      --------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 23 April 2016

तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है-----------

शकुनी छल से आज लुभाने बैठा है
कोई युधिष्ठिर दाँव लगानें बैठा है।

सारी दुनियाँ बेंच दी बस ऐय्यासी में
अब बंदर का खेल दिखानें बैठा है।

पूरी मेहफ़िल लूट लिया जब चन्दा ने
तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है।

राजा बनकर दर्द पियेगा जनता का
राज मिला तो ज़हर पिलानें बैठा है।

सारी बस्ती खाक् हुई तो क़ातिल भी
पानी लेकर आग बुझानें बैठा है।

एक दीवाना लगता है मर जायेगा
उल्फ़त में हर नाज़ उठानें बैठा है।

गद्दार पड़ोसी से थोड़ा होशियार रहो
धोखा देकर लाश बिछानें बैठा है।

हर बेटी नें ठान लिया कुछ करने की
"राजेश" खुशी से ग़ज़ल सुनानें बैठा है।

      --------राजेश कुमार राय।---------

Saturday, 19 March 2016

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का फागुन है दीवाना..............

बुराई जल गई, अब हो रहीं है प्यार की बातें
कहीं पर रंग की बातें, कहीं द़िलदार की बातें।

चेहरा चाँद जैसा और त़िल भी खूबसूरत है
ज़माना कर रहा है बस तेरे रूख़्सार की बातें।

यहाँ साकी चहकती है, वहाँ माली बहँकता है
यहाँ मैख़्वार की बातें, वहाँ ग़ुलज़ार की बातें।

इन्हीं रंगों की द़रिया में चलो हम डूब जाते हैं
कभी फुर्सत में होगी, फिर तेरे संसार की बातें।

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का, फागुन है दीवाना
खुमारी चढ़ गयी है अब करो झनकार की बातें।

जरा सी भूल मौसम को कहीं बे-रंग ना कर दे
चलो बच्चों से कर लेते हैं कुछ बेद़ार की बातें।

वफा की राह में"राजेश"अपना हक् अदा कर दे
ज़माना याद रखेगा, तेरे किरद़ार की बाते।

   ----------राजेश कुमार राय।-----------

Friday, 12 February 2016

दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो------

                    (1)
इंसान हूँ मगर मैं मुकम्मल न हो सका
शायद मेरे रक़ीब की कुछ बद्दुआ भी है।

                    (2)
दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो
शाम जब ढली तो मैकद़े पहुँच गया।

                    (3)
तेरा एहसान मुझ पर है इसे मैं भी समझता हूँ
मगर सबको बताकर तुमनें हल्का कर दिया इसको।

                    (4)
ज़िंदगी माँगकर ख़ुदा से क्या किया तुमनें !
ग़मे-हयात तुम्हे फिर से मार डालेगा।

                    (5)
जुगनूँ ने कहा चाँद से ललकार कर, मुझमें
रौशनी तो बहुत कम है, पर उधार की नहीं।

                    (6)
परिन्दा जब तलक उसका निवाला बन नहीं जाता
कोई मेहफ़िल मसर्रत की कभी पूरी नहीं होती।

                     (7)
इंतज़ार है तेरा, तू मेरे बज़्म में आकर
मेरे ऐतबार की ऐ दोस्त आबरू रख ले।

      -----------राजेश कुमार राय।----------

Wednesday, 30 December 2015

कभी न बुझ सके जो, वो शम्मा जलायेंगे..........

नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे
नेक काम करके गुलशन को सजायेंगे
तूफान चाहे जितनी ताकत लगा ले अपनी
कभी न बुझ सके जो वो शम्मा जलायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

गुमनाम ज़िंदगी से सड़कों पे निकलकर
फूलों से काँटों के रिश्ते को समझकर
मुश्किल हो चाहे जितनीं इस राहे-ज़िंदगी में
मंज़िल के पास जा कर दुनियाँ को दिखायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

सच्चाईयों के राह पे चलते ही रहेंगे
साहिल सा समंदर से लड़ते ही रहेंगे
आओ मेरे पास भटकते हुये लोगों
नये वर्ष को हम सब मिल के मनायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

ईमाँन से रहोगे तरक्की भी रहेगी
दोस्तों में प्यार की गंगा ही बहेगी
सूरज की रौशनी में सितारे भी दिखेंगे
चैन की बंशी हम दुनियाँ को सुनायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

कभी न बुझ सके जो, वो शम्मा जलायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

-----------राजेश कुमार राय।------------

Saturday, 14 November 2015

हाले-दिल को राज़ बनाकर दर्द बढ़ाया है मैनें.........

जुल्म बहुत है, कहाँ है ईश्वर, कब लेंगे अवतार बता
सारी दुनियाँ भाग रही है, तुम अपनी रफ़्तार बता।

हर रोज तरक्की होती है, अफ़सोस खज़ाना खाली है
किन हाथों से लुटता भारत जुड़ा कहाँ है तार बता।

हिज्र का मारा, शाख पे बैठे एक परिंदे से पूछा
प्यार के ज़ख्मी कुछ तो बोलो, पड़ी कहाँ है मार बता।

चारो तरफ एक कोलाहल है दहशत जैसा मंज़र है
बिना वजह के लाश बिछी है, कैसी है तलवार बता।

हाले-दिल को राज़ बनाकर दर्द बढ़ाया है मैनें
दिल की बातें रफ़्ता-रफ़्ता कर दूँ क्या इज़हार बता।

पानी का अम्बार लगा है मेघ बरसते जाते हैं
बाढ़ बहुत है, टूटी कश्ती, उतरूँ कैसे पार बता।

इस शहरे-जुदाई में मैनें अफ़सोस बहुत कुछ खोया है
सब धरती-अम्बर उसका है तो मेरा क्या है यार बता।

बेटा-बेटी पूरक हैं तो भेद यहाँ क्यों होता है
बेटा सोये बेटी रोये, ये कैसा अधिकार बता।

       -----------राजेश कुमार राय।----------

Thursday, 8 October 2015

दुकानें बन्द कर दो अब, दुआएँ बेचने वालों.....

                       (1)
दुकानें बन्द कर दो अब दुआएँ बेचने वालों
जमाना खुद बनायेगा मुकद्दर देख लेना तुम।

                       (2)
मुद्दतों बाद उसके हक् में फैसला आया
जिसके इंतज़ार मे साँसें ठहर गयी उसकी।

                       (3)
साकी ने दिया ज़ाम मगर बेरूखी के साथ
ऐसे में मैकशों को नशां खाक् चढ़ेगा।

                      (4)
गरीबों, के उजालों को छीनने वाला
तड़प-तड़प के अधेरों में मर गया आखिर।

                      (5)
परिंदा मार करके जीत का तुम जश्न करते हो
उनकी बद्दुआ से क्या तुम्हे कुछ डर नहीं लगता।

                      (6)
नजरें घड़ी पर, और बेचैनी से लगता है
कि महबूब ने मिलने का वादा कर लिया उससे।

    --------राजेश कुमार राय।-------

Saturday, 5 September 2015

मौंत नें जाल उस पर कसा इस कदर.......

कुचल करके सड़कों पे मारा गया
क्या तुम्हारा गया, क्या हमारा गया?

उस माँ पे क्या गुजरी है पूछो जरा
जिसके आँचल का कोई सितारा गया।

भँवर में फँसा था, तो कोई न आया
बस साहिल से मुझको पुकारा गया।

मौंत नें जाल उस पर कसा इस कदर
कि, वो मक्तल से आ के दुबारा गया।

सब फ़रिश्ते सफर में भटकते रहे
और सियासत में ज़ालिम सँवारा गया।

एक बेटी तरसती रही उम्र भर
प्यार, बेटे के हिस्से में सारा गया।

मैकद़ा, मैकद़ा ढूँढता रह गया
वो साकी गयी, वो नज़ारा गया।

जिसकी गवाही अहम थी उसे,
मौंत के घाट पहले उतारा गया।

---------राजेश कुमार राय।--------